कुछ कही कुछ अनकही

सुर्खरुँ करेँ इन्सान को,जमाने की अाधिँयाँ,फजाँ-ए-जमीँ मेँ इतनी ता कत तो नहीँ।तुम समझे थे टूट जायेँगेँ ठोकरोँ से। इन्साँ हैँ हम कोई इमारत तो नहीँ।

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आओ इस बार तो लम्हे कुछ लेते आना

Posted On: 12 Feb, 2018 में

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आओ इस बार तो कुछ लम्हे लाना
आओ इस बार
तो कुछ लम्हे लाना
थोड़ी सी मुस्कराहट चेहरे पर
थोड़ा सा दिल में सुकून भी लाना
आओ इस बार
तो कुछ लम्हे लाना ….
तोहफा बेशक कोई मत लाना
मुठ्ठी में अपनी मगर
वक्त का इक टुकड़ा
मीठा सा चुरा लाना
खुशियां कुछ, कुछ दर्द भी बांटें
कुछ घड़ियाँ दिन की साथ बिताये
आओ इस बार
तो लम्हे कुछ लेते आना …..
फिर कब मिलना हो कौन जाने
अहसास कुछ नए पुराने साझा कर लें
जिंदगी ने जो दिया वो और जो नहीं दिया
ये भी हिसाब जरा कर ले
आओ इस बार
तो लम्हे कुछ लेते आना …
निकल जाए न कहीं आँचल से
बचे हुए हैं जो लम्हे
इतने भी मसरुफ न हो जाएँ
आज को कल
कल को परसों में टालें
आओ इस बार
तो लम्हे कुछ लेते आना ………..
रंग जिंदगी यूँ ही दिखाती रहेगी
दस्तूर दुनिया का ना रुकेगा
पल थोड़े से तुम मेरी खातिर चुरा लाओ ना
आओ जो इस बार
तो लम्हे कुछ मेरी खातिर लेते आओ ना
छोटी सी इक ख्वाहिश है मेरी
आओ इस बार तो
लम्हे कुछ लेते आओ ना …….

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