कुछ कही कुछ अनकही

सुर्खरुँ करेँ इन्सान को,जमाने की अाधिँयाँ,फजाँ-ए-जमीँ मेँ इतनी ता कत तो नहीँ।तुम समझे थे टूट जायेँगेँ ठोकरोँ से। इन्साँ हैँ हम कोई इमारत तो नहीँ।

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हिमालय से संवाद, एक सैनिक का .......

Posted On: 28 Dec, 2017 में

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हिमालय से संवाद ,एक सैनिक का …….

हिमालय की साँझ
जला दीपक
न जाने
मन में क्यों
आया..,
मैं अकेला …,
केवल मैं अकेला ?
नहीं ?
नहीं तो फिर कौन है ?
साथी मेरा,,,,
हिमालय?
और रखवाला ?
हाँ ….
हिमालय है मेरा
और मैं हूँ उसका
फिर क्यों ?
मैं चिंतित
वो एक भूल थी
रक्षक
हम दोनों का
ऊपर वाला
हुआ सवेरा
किरणें आई
यूँ लगा
जवानी आई
ढल गया दिन
हुआ बदन जर्जर
बुढ़ापा भी
आता कुछ ऐसे
जीवन चक्र भी
दिन की तरह ही
आया और गया
रे मन
तू चिंता मत कर
जला दीपक
और
देख !
हिमालय की साँझ
कितनी आई
और
न जाने
कितनी आएंगी
लेकिन !
लेकिन!
हिमालय
खड़ाहै अटल
चुप
गंभीर
और अकेला भी
नहीं ?
नहीं तो फिर
कौन है उसका साथी ?
कौन रखवाला?
है ना…
मैं हूँ उसका
और
हिमालय है मेरा
हम दोनों
साथी
रखवाले
इक दूजे के
देश पर मिटने वाले
कभी ना पीछे हटने वाले …..
कभी ना पीछे हटने वाले …

चंदरसिंह दलाल

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