कुछ कही कुछ अनकही

सुर्खरुँ करेँ इन्सान को,जमाने की अाधिँयाँ,फजाँ-ए-जमीँ मेँ इतनी ता कत तो नहीँ।तुम समझे थे टूट जायेँगेँ ठोकरोँ से। इन्साँ हैँ हम कोई इमारत तो नहीँ।

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मुश्किल है

Posted On: 28 Dec, 2017 में

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है आसां

हर बात ज़माने की यारब
दिल को समझाना मुश्किल है……..
समझाना तो दूर रहा
इसको बहलाना मुश्किल है……….
भेदभाव मिट तो सकता है
पर पाठ पढ़ाना ये मुश्किल है ……
चलती का नाम तो गाड़ी है
पर उखड़ा खेल ज़माना मुश्किल है …..
समरसता के बिन जग में
अनुराग बढ़ाना मुश्किल है…….
है आसां किसी को अपनाना
पर उसको ठुकराना मुश्किल है…..
नैना उलझे इक बार कहीं तो
फिर उनको सुलझाना मुश्किल है
बेड़ियाँ बने जो रीत रिवाज
पीछा उनसे छुड़ाना मुश्किल है…..
अलसाये अधरों पर
आशा के फूल खिलाना मुश्किल है….
नहीं हया जिसकी आँखों में
उसका शर्माना मुश्किल है …
मानवमन तो बहल जाये
पर भगवन को बहलाना मुश्किल है ….
हँसते खेलते गुजरता बचपन
बड़े हुए तो मुस्काना मुश्किल है …..
रूठी हुई प्रेयसी को
देना कोई नज़राना मुश्किल है …..



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