कुछ कही कुछ अनकही

सुर्खरुँ करेँ इन्सान को,जमाने की अाधिँयाँ,फजाँ-ए-जमीँ मेँ इतनी ता कत तो नहीँ।तुम समझे थे टूट जायेँगेँ ठोकरोँ से। इन्साँ हैँ हम कोई इमारत तो नहीँ।

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कल्पना कभी कल्पित होती है क्या ?

Posted On: 28 Dec, 2017 कविता में

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कल्पना भी कभी कल्पित होती है क्या ?

कल्पना कभी कल्पित
भी होती है क्या ?
वेदना कभी उर में भी
सोती है क्या ?
और निशा निशा में
कभी रोती है क्या ?
नाव कभी साहिल से
टकराती है क्या ?
प्रीत अल्प समय की
प्रीत कहलाती है क्या ?
बरसे नैनो से जब बरखा
बरखा कहलाती है क्या ?



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