कुछ कही कुछ अनकही

सुर्खरुँ करेँ इन्सान को,जमाने की अाधिँयाँ,फजाँ-ए-जमीँ मेँ इतनी ता कत तो नहीँ।तुम समझे थे टूट जायेँगेँ ठोकरोँ से। इन्साँ हैँ हम कोई इमारत तो नहीँ।

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दूसरी बेटी ?

Posted On 19 Dec, 2017 में

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न जाने कितने साल बीत गए फिर भी हर सुबह मंदिर में दिया जलाते हुए उसकी आँखे उस एक फोटो पर ठहर जाती है और न चाहते हए भी वो फिर उन्ही पलों में चली जाती है जब उसने जिंदगी का एक नया रंग और अपनों का नया रूप देखा था , वो वक्त जब वो एक जज़ीरा बन कर रह गई थी , आर्यसमाजी परिवार में पैदा होने के कारण कभी पूजा पाठ नही की .. पर जब दिल बेसहारा हुआ तो घर में एक एकांत कोना बना कर एक छोटा सा मंदिर बनाया और दिया जलाना शुरू किया ,एक दिन बिटिया के साथ जा कर मंदिर के लिए हनुमान जी की फोटो ले ली आखिर हिम्मत तो उन्ही से लेनी थी ,,हिम्मत अकेले चलने की .हिम्मत कुछ फैसले लेने की,
याद है उसे वो दिन जब बिटिया के लिए एक छोटे भाई बहन के आने की खबर सुनकर पतिदेव ने कहा था ज्यादा खुश मत हो देखना फिर से लड़की ही होगी ….
तो क्या हुआ ? और तुम्हे कैसे पता कि लड़की ही होगी ?
मुझे पता है ..मेरी किस्मत ही ऐसी है .
अरे इसमें किस्मत कहां से आ गई ?
चुप रहो तुम .
और उसी पल से सब बदल गया
घर में चुप्पी रहने लगी
आने वाले का स्वागत नही होने वाला था अगर वो …,,,,,,,,,,,,,?
मां बाबु जी मिलने आये तो सब समझ गए और अपनी बेटी के भविष्य को सुरक्षित करने की खातिर मेरे आगे वो प्रस्ताव रख बैठे जो जिंदगी के साथ खिलवाड़ था ,, एक डॉक्टर का पता लेकर आये थे ..ससुराल में बेटी सही सलामत रहे इसलिए ….
,,,,जिसे सुनकर वो सहम गई ..
आदर सहित उन्हें समझाया आपने मुझे अच्छी शिक्षा दी है हर मुश्किल का सामना करना सिखाया है . ऐसा कोई कदम उठाने के बारे में मत सोचिये मुझे अपनी बेटी के लिए एक साथी चाहिए , ऊपर वाला मुझे जो भी दे पर साथ में हिम्मत दे यही मेरी प्रार्थना है .
पति और कठोर होते गए , जरुरत के वक्त ससुराल से कोई नही आया ,,,,
मां बाबूजी अपने साथ ले गए ,
वक्त के साथ बिटिया को नन्हा भाई मिला
पति को ,और ससुराल में खबर दे दी गई .
पति भागे भागे आये ,,,,नाम भी रख लिया था अपने आप
फटाफट घर ले आये ,,,
सब खुश हो रहे थे और वो बदलते रंग देख रही थी
बेटे को पाकर भी पति बेटी को ज्यादा प्यार करने थे ,,उसको बहुत अच्छे स्कूल में भेजा ,,डॉक्टर बनाया .कभी पैसे की कमी नही होने दी ..आज भी उस पर जान देते हैं ….फिर बेटे ने आकर क्या जादू कर दिया ?
बाप बेटे ज्यादा नजदीक भी नही थे .
वो जितना भी समझने की कोशिश करती पहेली उतनी ही उलझ जाती
क्या होता अगर बेटी होती तो .?
क्यों दूसरी बेटी से वो इतना डर गए थे ?
क्या वो फिर कभी मुझे लेने नही आते ?
मैं दो बेटी पैदा करके क्या गुनाह करने वाली थीं ?
और बेटे ने ऐसा क्या दे दिया जो सब बदल गया ?
लेकिन क्या सचमुच सब बदल गया ?
नही ..
जो दर्द वो बेरहम पल दे गए वो कैसे बदलेगा ?
एक अजन्मे जीव को कत्ल करने की सोच का गुनाह कैसे बदलेगा ?
बेटियां बेटों से कमतर समझने की सोच कब बदलेगी ?
अगर नही तो क्यों उसके आने का स्वागत नहीं किया जाता ? आज भी ,,,
यह सवाल आज भी अपना जवाब ढूंढ रहा है?
एक और सुबह मन्दिर में दिया जलते हुए इस अनबूझे सवाल का जवाब उसे आज भी नही मिला
क्या इस सवाल का जवाब आपको ,हमको कभी मिलेगा ?
सोच कर देखिये ,,,,,

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