कुछ कही कुछ अनकही

सुर्खरुँ करेँ इन्सान को,जमाने की अाधिँयाँ,फजाँ-ए-जमीँ मेँ इतनी ता कत तो नहीँ।तुम समझे थे टूट जायेँगेँ ठोकरोँ से। इन्साँ हैँ हम कोई इमारत तो नहीँ।

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फिर हुए खुद से दूर हम

Posted On: 19 Dec, 2017 में

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भरम टूटा यूँ कि……

चुप रहते हैं बोलते नहीं आजकल
भरम टूटा यूँ कि समझदार हो गए

दर्द का एहसास होता ही नहीं
जख्म मिले इतने गहरे कि दर्द से बेज़ार हो गए

किसान जब से कर्ज़दार हो गए
व्यापारी जमींदार हो गए

होने लगा ख्यालों खवाबों का मोल
जिंदगी हम तेरे कर्ज़दार हो गए

बनाने वाले ही तोड़े रहे सरेआम
कानून वैसे तो बेशुमार हो गए

बीच सड़क अस्मिता तार तार होती हर रोज
बिक गए या लापरवाह पहरेदार हो गए

क्या पहने क्या खाये क्या बोले
कुछ लोग हर बात के ठेकेदार हो गए

एक नाम एक ही था मालिक इस दुनिया का
नाम, रूप उसके आज हजार हो गए

किसीका खुदा ,किसीका भगवान,ईसा किसीका
कितने आज मौला तेरे हक़ दार हो गए

खुशनुमा लम्हों को यादों में सजाया लिया जबसे
घर आँगन सब गुलजार हो गए

पढ़ पाए न चेहरों की इबारतें
इस इम्तहान में फेल हम कई बार हो गए

फिर हुए खुद से दूर हम
जब जब सोचा हम समझ दर हो गए

बहुत लम्बी सी इस डगर में जिंदगी
तेरी कहानी का छोटा सा किरदार हो गए

तनहा पाया जब जब बीच भवँर में
खुद ही अपनी कश्ती के हम पतवार हो गए

सुकून के कुछ पल मिले थे अभी, कि
शोरो- गुल से फिर दो चार हो गए

सिर्फ हादसों की दुकान, आजकल
ये सारे अखबार हो गए

परदे में रहने वाले खूबसूरत लम्हे भी
अब तो सड़क में टंगे हुए इश्तिहार हो गए

ऐसा कभी हुआ ही नहीं

चुप रहते हैं बोलते नहीं आजकल
भरम टूटा यूँ कि समझदार हो गए

दर्द का एहसास होता ही नहीं
जख्म मिले इतने गहरे कि दर्द से बेज़ार हो गए

किसान जब से कर्ज़दार हो गए
व्यापारी जमींदार हो गए

होने लगा ख्यालों खवाबों का मोल
जिंदगी हम तेरे कर्ज़दार हो गए

बनाने वाले ही तोड़े रहे सरेआम
कानून वैसे तो बेशुमार हो गए

बीच सड़क अस्मिता तार तार होती हर रोज
बिक गए या लापरवाह पहरेदार हो गए

क्या पहने क्या खाये क्या बोले
कुछ लोग हर बात के ठेकेदार हो गए

एक नाम एक ही था मालिक इस दुनिया का
नाम, रूप उसके आज हजार हो गए

किसीका खुदा ,किसीका भगवान,ईसा किसीका
कितने आज मौला तेरे हक़ दार हो गए

खुशनुमा लम्हों को यादों में सजाया लिया जबसे
घर आँगन सब गुलजार हो गए

पढ़ पाए न चेहरों की इबारतें
इस इम्तहान में फेल कई बार हो गए

फिर हुए खुद से दूर हम
जब जब सोचा हम समझ दर हो गए

बहुत लम्बी सी इस डगर में जिंदगी
तेरी कहानी का छोटा सा किरदार हो गए

तनहा पाया जब जब बीच भवँर में
खुद ही अपनी कश्ती के हम पतवार हो गए

सुकून के कुछ पल मिले थे अभी, कि
शोरो- गुल से फिर दो चार हो गए

सिर्फ हादसों की दुकान, आजकल
ये सारे अखबार हो गए

परदे में रहने वाले खूबसूरत लम्हे भी
अब तो सड़क में टंगे हुए इश्तिहार हो गए

ऐसा कभी हुआ ही नहीं

चुप रहते हैं बोलते नहीं आजकल
भरम टूटा यूँ कि समझदार हो गए

दर्द का एहसास होता ही नहीं
जख्म मिले इतने गहरे कि दर्द से बेज़ार हो गए

किसान जब से कर्ज़दार हो गए
व्यापारी जमींदार हो गए

होने लगा ख्यालों खवाबों का मोल
जिंदगी हम तेरे कर्ज़दार हो गए

बनाने वाले ही तोड़े रहे सरेआम
कानून वैसे तो बेशुमार हो गए

बीच सड़क अस्मिता तार तार होती हर रोज
बिक गए या लापरवाह पहरेदार हो गए

क्या पहने क्या खाये क्या बोले
कुछ लोग हर बात के ठेकेदार हो गए

एक नाम एक ही था मालिक इस दुनिया का
नाम, रूप उसके आज हजार हो गए

किसीका खुदा ,किसीका भगवान,ईसा किसीका
कितने आज मौला तेरे हक़ दार हो गए

खुशनुमा लम्हों को यादों में सजाया लिया जबसे
घर आँगन सब गुलजार हो गए

पढ़ पाए न चेहरों की इबारतें
इस इम्तहान में फेल कई बार हो गए

फिर हुए खुद से दूर हम
जब जब सोचा हम समझ दर हो गए

बहुत लम्बी सी इस डगर में जिंदगी
तेरी कहानी का छोटा सा किरदार हो गए

तनहा पाया जब जब बीच भवँर में
खुद ही अपनी कश्ती के हम पतवार हो गए

सुकून के कुछ पल मिले थे अभी, कि
शोरो- गुल से फिर दो चार हो गए

सिर्फ हादसों की दुकान, आजकल
ये सारे अखबार हो गए

परदे में रहने वाले खूबसूरत लम्हे भी
अब तो सड़क में टंगे हुए इश्तिहार हो गए

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2 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

mrssarojsingh के द्वारा
December 22, 2017

मेरा उत्साह बढ़ाने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद मदन जी , आप जैसे लेखक से प्रशंसा ने मुझे नई ऊर्जा दी है आशा है कि आगे भी मुझे आप का सहयोग मिलता रहेगा . पुनः धन्यवाद


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