कुछ कही कुछ अनकही

सुर्खरुँ करेँ इन्सान को,जमाने की अाधिँयाँ,फजाँ-ए-जमीँ मेँ इतनी ता कत तो नहीँ।तुम समझे थे टूट जायेँगेँ ठोकरोँ से। इन्साँ हैँ हम कोई इमारत तो नहीँ।

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बदलते किरदार

Posted On: 16 Dec, 2017 में

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बदलते किरदार

आज फिर दिसंबर की १६ तारीख आई है , वो तारीख जिसने 221- L model town -की सुबह का रंग बदल दिया। .अब वहां हर सुबह बेसब्री के अख़बार वाले का कोई इंतज़ार नहीं करता। अब इतनी शिद्दत से अख़बार की हर खबर पढ़ कर उनका विश्लेषण नहीं करता। परिवारके हर सदस्य अपने पास बिठा कर चाय की चुस्कियों के साथ खबरों का सार नहीं बताता। और किसी लेख को आधार बना कर उसी रोज प्रेस में नहीं भेजता,जो अगले कुछ दिनों में छप जाता या रेडियो स्टेशन से प्रसारित हो रहा होता था या फिर टीवी के किसी चैनल पर dady अपनी खनकती दमदार आवाज और चमकते चेहरे के साथ. गर्मागर्म बहस कर रहे होते थे ,
ऐसे मेरे dady ,,साथ न होकर भी इन सब चीजों में हमारे साथ हैं। .हर सुबह जब मैं पेपर उठाने के लिया दरवाजा खोलती हूँ तब वो मेरे साथ होते हैं ,,,, जब मैं रेडियो पर खबर या गाने सुनती हूँ तब उनका छोटा ट्रांसिस्टर याद आता है जो सोते जागते हमेशा साथ रहता था .
हर शाम को छह बजे अब मेरे फोन की घंटी नहीं बजती जो पापा की खनकती हंसी लेकर आती थी,, परिवार के हर सदस्य की सारी ख़बरें बताते थे। ऐसा महसूस होता है कि वो अभी भी आसपास है अपने बच्चों के साथ हैं। कहीं नहीं गए ,,,यही हैं
बस अभी चाय बनाने के लिए कहेंगे ,,,,या किसी बात पर ज़ोर से डाटेंगे ..पर उस डांट में जितना प्यार घुला होता था उसकी मिठास तो आज भी हमारे साथ है। …और शायद सदा रहेगी
उनकी सभी चीजे जैसे ,चश्मा ,अधलिखी ,डायरियां ,किताबे ,कविताएं और बहुत कुछ को संजों कर अपने पास रखा है ,,इन सब चीजों में पापा की खुशबू है ,स्पर्श हैं। .. यहां तक की मेरे मोबाइल नंबर आज भी ,,dady ,के नाम से saved है ,, कभी कभी उस नंबर को देखती हूँ ,,,और सोचती हूँ शायद dady अभी बोलेंगे। …पर नहीं ऐसा कहाँ होताहै ,,,,
उनके साथ आखिर बिताये दिन बहुत याद आते हैं। .वो मेरे पास अपने एक केस के सिलसिले में आये थे ,,लिखना, पढ़ना और वकालत तो उनके जीवन का अटूट हिस्सा था। ..और उनका छोटा transistor तो उनके साथ ही चलता था। रोज खाना खाकर टीवी की खबर सुनकर जल्दी सोने चले जाते थे पर ट्रांजिस्टर चलता रहता था इसलिए मैं सोने से पहले उनके कमरे में जाकर सोते हुए उनकी साथ चादर या रजाई ठीक करने के ट्रांजिस्टर बंद करती और कुछ देर वहां कड़ी होकर उन बीते दिनों में चली जाती थी जब मैं पढ़ते पढ़ते सो जाती थी और मेरा ट्रांजिस्टर चल रहा होता था,., dady सोने से पहले रोज मेरे कमरे में जरूर आते थे और मेरे चलते ट्रांजिस्टर को बंद करने के साथ मेरी रजाई या चादर ठीक से उढ़ाते ,.,,,,
कभी कभी मैं आधी नींद में होती थी और बोले बिना उनके इस प्यार दुलार को अपने अंदर समेट लेती थी।
.समय चक्र कैसे किरदार बदल देता है। जब बेटी पिता के लिए वो करती है जो पिता ने कभी अपनी लाड़ली के किया होता है,,,,,
इसी तरह वो अनगिनत चीजों में ,,बातों में ,,,यादों में हमारे साथ…… यहीं कही आस पास।

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