कुछ कही कुछ अनकही

सुर्खरुँ करेँ इन्सान को,जमाने की अाधिँयाँ,फजाँ-ए-जमीँ मेँ इतनी ता कत तो नहीँ।तुम समझे थे टूट जायेँगेँ ठोकरोँ से। इन्साँ हैँ हम कोई इमारत तो नहीँ।

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कहां आज़ाद हैं हम ?

Posted On: 9 May, 2017 ज्योतिष में

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सफ़ीनों से किनारों से
बेजार हुए नजारों से

कहाँ आजाद हैं हम तुम
सवालों से जवाबों से

मिले कई जख्म इस दिल को
अजीजों से बेगानों से

परेशां किस कदर हैं हम
हकीकत से फसानों से

उम्र सारी कटी यूँ ही
कैसे कैसे सहारों से

अजब सा खौफ है छाया
ज़मीं को क्यों सितारों से

घिरे है बेवजह ही हम
पुराने से पैमानों से

कटेगी जिंदगी कैसे
तेरे झूठे बहानों से

सरोज सिंह
९/०५/२०१७
मेलबोर्न



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