कुछ कही कुछ अनकही

सुर्खरुँ करेँ इन्सान को,जमाने की अाधिँयाँ,फजाँ-ए-जमीँ मेँ इतनी ता कत तो नहीँ।तुम समझे थे टूट जायेँगेँ ठोकरोँ से। इन्साँ हैँ हम कोई इमारत तो नहीँ।

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क्या से क्या हो गए हम ....

Posted On: 28 Apr, 2017 में

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क्या से क्या हो गए हम

क्या से क्या हो गए
जिंदगी
साथ तेरा निभाने में
हम न हम रहे
जिंदगी
पहचान तेरी बना ने में
बदले नक़्श हमारे
जिंदगी
चेहरा तेरा सजाने में
रूठ गए कितने अरमान हमारे
जिंदगी
फकत तुझको मनाने में
वो जो थे करीब बहुत
जिंदगी
छोड़ हमे जा मिले जमाने में
दिया न कुछ भी छालों के सिवा
जिंदगी
चुन बैठे हम राह वही अनजाने में

सरोज सिंह .
२/०६/२०१७



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3 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

mrssarojsingh के द्वारा
May 7, 2017

बहुत बहुत धन्यवाद आपका शोभा जी ,बहुत अच्छा लगता है जब आप जैसे साहित्यकार मेरी कोई रचना पढ़ते के साथ साथ प्रतिक्रिया भी देते हैं ,,,,,,,सच पूछिए तो ऐसे में अपने भाव व्यक्त करने का हौंसला बढ़ जाता है …. उम्मीद है की आप लका साथ यूँ ही बना रहेगा धन्यवाद सहित सरोज

Shobha के द्वारा
May 7, 2017

प्रिय सरोज जी खुबसूरत पंक्तियाँ मन को छूने वाले भाव से पूर्ण पंक्तियाँ

Shobha के द्वारा
May 7, 2017

प्रिय सरोज जी खुबसूरत पंक्तियाँ मन को चूने वाले भाव


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