कुछ कही कुछ अनकही

सुर्खरुँ करेँ इन्सान को,जमाने की अाधिँयाँ,फजाँ-ए-जमीँ मेँ इतनी ता कत तो नहीँ।तुम समझे थे टूट जायेँगेँ ठोकरोँ से। इन्साँ हैँ हम कोई इमारत तो नहीँ।

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ज़रा सी हिम्मत ....(contest )

Posted On: 30 Mar, 2017 Contest में

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नई नवेली दुल्हन जब ससुराल में पहला कदम रखती है तो उसकी आँखों में ढेरों सुहाने सपने और मन में नए जीवन की सुनहरी तस्वीर के साथ कुछ शंकाएं भी तैर रही होती हैं .. अब तक शहर में रहने वाली , कान्वेंट की पढ़ी ,एक फौजी की लाडली बेटी का एक फौजी अफसर से विवाह का निर्णय खुद का था यह जानते हुए भी कि ससुराल गॉव में है .
विवाह के बाद देहरी पर जैसे ही पहला कदम रखा वो शंकाओं को सच करने वाला था . हर कोई दुल्हन को सिर से पैर तक ऐसे निहार रहा था मानों चिड़िया घर में कोई नया जानवर आया हो . शहर की छोरी का लेबल काफी था सारी गली के महिला वर्ग को इक जुट करने में ,,.कद ,रंग , नाक नक्श जैसे हर पहलू पर जमकर बहस चल रही थी… अचानक किसी वृद्धा की नज़र मेरे बालों पर पड़ गई जो घूँघट से झांक रहे थे ,,, .फिर तो जो हंगामा हुआ वो बयान के बाहर है ….. कई हाथों ने मिल कर मेरे बालों को ढकने के बाद मुझे नसीहत दी कि ऐसा (अपराध ) फिर कभी नही होना चाहिए ,,,, तभी किसी ने ताना कस दिया कि और लाओ शहर की पढ़ी लिखी बहू…..
.कॉलेज में समाज सुधार पर भाषण देने वाली लड़की ने मन ही मन कुछ चिंतन किया …. आगे आने वाले दिन मुश्किल होंगे यह अहसास हो गया था . अपने घर में मैंने बहुओं को सास ससुर का आदर करते हुए और सर पर पल्ला रखते हुए देखा था पर लम्बा घूँघट ?
खैर अगले कुछ दिन ऐसे ही गुजरे ..टोका टाकी चलती रही ,,हिदायते भी मिलती रही … जब तक घर से बाहर नही जाना पड़ा सब ठीक रहा .पर एक दिन जब मंदिर जाने के लिए से घर के बाहर जाना पड़ा तो जेठानी ने इतना लंबा घूंघट निकाल दिया कि दम घुटने लगा और चलने में भी मुश्किल होने लगी.कुछ कदम चलने के बाद मैंने घूँघट हटा कर सिर्फ सिर को चुन्नी से ढक लिया और मन ही मन एक फैसला भी ले लिया .
इतने में साथ चल रही जेठानी ने जैसे ही फिर मेरा चेहरा ढकना चाहा मैंने उन्हें बड़ी नरमी से रोक दिया और कहा कि मैं ऐसे ही आँचल सर पर रखूंगी ,, आप परेशान ना हो . और ऐसे ही हम मंदिर जा कर वापिस घर आये तो मैंने खुद आने वाले संकट के लिए तैयार कर लिया था ….सवालों के जवाब के लिए .
पर यह क्या यहां तो सब कुछ ठीक था ..किसी ने कुछ नही कहा ..घर की महिलाये थोड़ी नाराज लगी पर बोली कुछ नही ..अगले दिन सुबह हम पति पत्नी को ससुर जी ने बैठक में बुलाया . सर पर पल्ल्ला लिए और मन में एक निश्चय ले कर मैं पति के साथ बैठक में गई .
ससुर जी ने कहा “बेटी मैं तुम्हारे पिता समान हूँ और तुम दोनों जहां भी रहोगे मैं तुम्हारे पास तो आया ही करूंगा और तब अगर यह ( उनका पुत्र ) घर पर नही हुआ तो तुम्हे मुझसे बात करनी ही होगी इसलिए अब से तुम सिर्फ सर ढक लिया करो मेरे लिए यही काफी है घूँघट की कोई जरूरत नही है बस बड़ों की इज़्ज़त करते रहना ,, कुछ और बाते करने के बाद उन्होंने हमें आशीर्वाद के बाद विदा किया ,बैठक के बाहर आते आते तो खबर गावँ भर में फ़ैल चुकी थी .. जिसने धीरे धीरे क्रांति का रूप ले लिया .घूँघट से आज़ादी की क्रांति का ,
जिसका फल यह हुआ कि आज मेरी ससुराल घूँघट मुक्त है ,मेरे बाद आने वाली हर बहू आज़ाद है ,

हवाओं ने ज़रा सी हिम्मत क्या दिखाई
खुश्बूएँ भी खुद्दार हो गई
ज़र्रा ज़र्रा चमन का उस पल से
अपने हक़ का तलबगार हो गया



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2 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

mrssarojsingh के द्वारा
April 1, 2017

हौंसला अफ़ज़ाई के बहुत बहुत धन्यवाद सिंसेरा जी …….

sinsera के द्वारा
March 31, 2017

कुरीतियों के खिलाफ चोट करने के लिए आपको साधुवाद.


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