कुछ कही कुछ अनकही

सुर्खरुँ करेँ इन्सान को,जमाने की अाधिँयाँ,फजाँ-ए-जमीँ मेँ इतनी ता कत तो नहीँ।तुम समझे थे टूट जायेँगेँ ठोकरोँ से। इन्साँ हैँ हम कोई इमारत तो नहीँ।

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मरने से भी डरते हैं......

Posted On: 27 Mar, 2017 में

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मरने से भी डरते है
और मुश्किल है जीना भी

रूठे जब सागर, रूठे
मौज़े और सफीना भी

कातिल से ही सीख गए
हम चाक ज़िगर सीना भी

बेबाक सही अदा तेरी
रख इक पर्दा झीना भी

कांच से भी कमतर फिर तो
नकली गर हो नगीना भी

खुदगर्ज़ी छोड़, सीख जरा
मिल कर खाना पीना भी

सरोज सिंह
२७ मार्च २००७
११.११ सुबह
मेलबर्न
ऑस्ट्रेलिया



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