कुछ कही कुछ अनकही

सुर्खरुँ करेँ इन्सान को,जमाने की अाधिँयाँ,फजाँ-ए-जमीँ मेँ इतनी ता कत तो नहीँ।तुम समझे थे टूट जायेँगेँ ठोकरोँ से। इन्साँ हैँ हम कोई इमारत तो नहीँ।

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आह मिलीं कभी तो कभी वाह मिली ..........

Posted On: 2 Feb, 2016 में

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आह मिली कभी तो कभी आह मिली

किस्सा-ए-जिंदगीं है अजब यारब
आह मिलीं तो कभी वाह मिली
मिलने को बहुत कुछ मिला यूँ तो
सबको मगर कहाँ अपनी चाह मिली
हैंकुछ खुशकिस्मत लोग भी जिनको
जब मिली खुशियां बेपनाह मिलीं
कुछ बदनसीब चौराहो पर खो गए
मंजिल तक जाने वाली न राह मिली
खोज में तेरी अब तक भटका किये
कहाँ मगर किसी को है तेरी थाह मिली
कौन समझा जिंदगी तुझको
आह मिली कभी तो कभी वाह मिली

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1 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

sadguruji के द्वारा
February 6, 2016

कौन समझा जिंदगी तुझको ! आह मिलीं तो कभी वाह मिली !! बहुत भावपूर्ण और सुन्दर रचना ! बहुत बहुत अभिनन्दन और बधाई !


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