कुछ कही कुछ अनकही

सुर्खरुँ करेँ इन्सान को,जमाने की अाधिँयाँ,फजाँ-ए-जमीँ मेँ इतनी ता कत तो नहीँ।तुम समझे थे टूट जायेँगेँ ठोकरोँ से। इन्साँ हैँ हम कोई इमारत तो नहीँ।

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तू भी कर गया मौला किफायतें

Posted On: 1 Feb, 2016 Others में

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दे के थपकियां सुलाया लाख हमने
मचल गई फिर भी ख्वाहिशें
समझाया बहुत हमने
देख उनको फिर भी तेज हुई सांसें
बंटने लगी जब खुशियां
किस्मतें कर गई सियासतें
चाहे न चाहें हम यारब
निभानी तो पड़ती हैं रिवायतें
बरसातें बरसातें मुझ पर नियामतें
तू भी कर गया मौला किफायतें

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