कुछ कही कुछ अनकही

सुर्खरुँ करेँ इन्सान को,जमाने की अाधिँयाँ,फजाँ-ए-जमीँ मेँ इतनी ता कत तो नहीँ।तुम समझे थे टूट जायेँगेँ ठोकरोँ से। इन्साँ हैँ हम कोई इमारत तो नहीँ।

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अँधेरे /उजाले

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अँधेरे उजाले
———————
छोड़ दृगों को निकल जाते हैं भ्रमण पर यह
सपने कभी कभी
घूम आते है दूर देश दुनिया यह
सपने कभी कभी
अतीत भविष्य को भी छान आते हैं यह
सपने कभी कभी
मिलन ,विरह ,सुख दुःख के बीते पलों को भी छूकर आ जाते हैं यह
सपने कभी कभी
एकाकी और भीड़ में खोई हुई कहानियों को भी फिर से छेड़ आते है यह
सपने कभी कभी
कुछ भूली हुई आकांक्षाओं और अभिलाषाओं से भी मुलाकात कर आते हैं यह
सपने कभी कभी
जो न हो सके पूरे अपने उन अभागे साथियों को दिलासा दे आते यह है
सपने कभी कभी
और फिर चुपके से एक नया सवेरा होने से पहले आँखों में समा जाते हैं यह नटखट
सपने कभी कभी

संवेदनाएं/ भावनाएं
————————-

सदा महकती हैं भावनाएं हवाओं में /
कभी रिश्तों की सुगंध बनकर /
कभी दर्द की मसीहा बनकर /
कभी विरह की उर्मिला बनकर /
और कभी अलगाव की मौन पाती बनकर/

अँधेरे /उजाले
——————–
बहुत चर्चा करते जो
उजालों की, कहकहों की
अक्सर वही
उदासी के अंधेरो में
खोये होते हैं
भीड़ का हिस्सा होते हुए भी
वही अक्सर
खुद में इक जजीरा होते है.

हिसाब /किताब
—————————
इक दिन यह ख्याल आया
कुछ हिसाब करे जिंदगी में
क्या खोया क्या पाया ?
किया जब जोड़ घटा गुना
तो बस यह समझ में आया
हिसाब किता करना भला हमें कब आया ?

परवाज़
——————

आज फिर रूह के किवाड़ों को खोल
परवाज़ मेरी
आज़ाद हो गई
दुनिया मेरे अल्फ़ाज़ों की आबाद हो गई
शायद सोच मेरी
आज फिर इक ग़ज़ल का अंदाज़ हो गई

तन्हाई
————–
मुस्कुरा कर गैरों के संग
किसको बहका रहे हो ?
तन्हाइयों में अश्कों के
दरिया में डूबता देखा हैं हमने तुम्हे
खुद से तो नजर चुरा लोगे
क्या जवाब दोगे जब
आइना सवाल पूछेगा तुमसे?
रिश्ता
—————
रिश्ता अल्फ़ाज़ों का कागज़ से है अज़ब
रेत पर जैसे बूंदे बरस कर
उकेर जाएँ कुछ निशाँ
या अंधेरों में रौशनी अक्स बनकर उत्तर जाएँ
यूँ ही तो रुहैं कुछ बेदार होती हैं
कागज़ कलम की कर्ज़दार होती हैं
अल्फ़ाज़ों को कागज़ की जमीन पे उतार
गीतों ग़ज़लों का नाम देती हैं

उदासी का एक सिरा
———————–
कभी कभी मेरा मैं
मुझे मेरे ही सामने खड़ा कर देता है
और स्वयं अदृशय हो जाता है
अँधेरे में ,
मैं
बस वो होता हूँ
जो मैं हूँ
पर यह अँधेरा
एक नेमत है
खुद से खुद को छुपा कर
उजालों में फिर से
खुद से आँख मिलाने की
गुंजायश छोड़ देता है
कितने रंगों का
मिलन हैं यह अँधेरा
जिसका एक सिरा है उदासी
और दूसरा सिरा बंधा है खुशियों से



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2 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Shobha के द्वारा
November 30, 2014

सरोज जी बड़ी ही खूबसूरत कविता खुद से खुद को छुपा कर ——-दूसरा सिरा बंधा है खुशियों से अति सुंदर डॉ शोभा

    mrssarojsingh के द्वारा
    December 1, 2014

    धन्यवाद शोभा जी , मेरी कविता आपको पसंद आई यह मेरे सौभाग्य हैं ऐसे सुंदर शब्द अपने विचारों को साझा करने की हिम्मत देते हैं …………. सरोज


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