कुछ कही कुछ अनकही

सुर्खरुँ करेँ इन्सान को,जमाने की अाधिँयाँ,फजाँ-ए-जमीँ मेँ इतनी ता कत तो नहीँ।तुम समझे थे टूट जायेँगेँ ठोकरोँ से। इन्साँ हैँ हम कोई इमारत तो नहीँ।

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शब्दों की नाव बनाकर ....

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जीवन जिया मैंने शब्दों की नांव बना कर

जीवन जिया मैंने
शब्दों की नाव बना कर ..
लेकर सहारा रिश्तो की पतवार का
चलती रही लहरों पर जीवन की
थामे कलम हाथों में
उकेरा उन यादों को
मिली थी सौगातों में जो
कुछ अपनों से कुछ परायों से
उठाई कुछ कहानियाँ आसपास से
पिरोया दर्द/चुभन को कविता की लड़ियों में
बात मन की कुछ अपनी कुछ औरों की
करता गया कागज़ के हवाले
लिपटा कर कल्पना की रेशमी चादर में
कर लिया खुद को हल्का
बाँट कर दर्द के सेहराओं
अहसासों के समंदरों को
और बस यूँ ही
जीवन जिया मैंने
शब्दों की नाव बना कर



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2 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Shobha के द्वारा
November 30, 2014

सरोज जी शब्दों की नाव बना कर सुंदर शीर्षक के साथ बड़ी प्यारी छोटी सी कविता डॉ शोभा

    mrssarojsingh के द्वारा
    December 1, 2014

    बहुत ही अच्छा महसूस होता है शोभाजी जब ऐसे प्यारे कमेंट मिलते है . धन्वाद स्वीकार करें सरोज


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