कुछ कही कुछ अनकही

सुर्खरुँ करेँ इन्सान को,जमाने की अाधिँयाँ,फजाँ-ए-जमीँ मेँ इतनी ता कत तो नहीँ।तुम समझे थे टूट जायेँगेँ ठोकरोँ से। इन्साँ हैँ हम कोई इमारत तो नहीँ।

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रीता /अनरीता

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रीता/ अनरीता
रेत का घरौंदा बनाते
कभी इकठ्ठा करते सीपियाँ ढेरों
रेत से मुठ्ठियां , कभी भरते
कभी रिताते हुए
हँसते खिलखिलाते
नन्हे बच्चे
ऐसे जैसे मेरा मन …
कभी रेत से भरी मुठ्ठी जैसा
तो कभी मुठ्ठी से फिसलते रेत सा
रीता
खाली
हर अहसास से
वैसे ही जैसे
अमावस की रात का बिन तारों का आसमान
जिसमें तारें होते तो हैं पर दिखते नहीं
वैसा ही रीतापन
जैसे
आसमान का सपाट चेहरा
जो भरा है यूँ तो तारों से
अनगिनत ख्यालों से लबालब
मेरा यह मन
कभी कभी जाने क्यों
हो जाता है
अमावस की रात सा
सपाट
सूना
खाली भी
भरा भी
समंदर किनारे रेत का घर बनाते
उस नन्हे बच्चे की मुठ्ठी सा
अभी रीता/अभी अनरीता सा



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2 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Shobha के द्वारा
November 30, 2014

सरोज जी आप बड़ी ही भाव पूर्ण कबिता लिखती हैं डॉ शोभा

    mrssarojsingh के द्वारा
    December 1, 2014

    अनेकों धन्वाद स्वीकार करें शोभाजी आशा है आगे भी आपका साथ ऐसे ही मिलता रहेगा . सरोज


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