कुछ कही कुछ अनकही

सुर्खरुँ करेँ इन्सान को,जमाने की अाधिँयाँ,फजाँ-ए-जमीँ मेँ इतनी ता कत तो नहीँ।तुम समझे थे टूट जायेँगेँ ठोकरोँ से। इन्साँ हैँ हम कोई इमारत तो नहीँ।

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तूफान कई /मेरी दुनिया का /पता ले आये ..........

Posted On: 1 Aug, 2014 Others,Contest,Entertainment में

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तूफान कई /मेरी दुनिया का /पता ले आये
कहाँ लौटते हैं?
वो पल
गुजर जाते हैं जो
कहाँ मिटते हैं?
निशां उन पलों के
दिल की जमीं से
बहा ले जाता है
साथ अपने
वक्त जिन पलों को……….

——————

था वो मौसम
यूँ तो बहारों का
बेरुखी ने तक़दीर की जिसे
पतझड़ में बदल दिया

———————
आई थी रुत बसंती भी यूँ तो
ओढ़े हुए चुनर सतरंगी
होती जब तक पहचान मेरी उससे
जाने कहाँ से
तूफ़ान कई,
मेरी दुनिया का पता ले आये …………

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4 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
August 1, 2014

था वो मौसम यूँ तो बहारों का तक़दीर की बेरुखी ने जिसे पतझर में बदल दिया ह्रदय स्पर्शी पंक्तियाँ ,सरोज जी भावनाओं को शब्दों में सलीके से पिरोया है ,हार्दिक बधाई.

    mrssarojsingh के द्वारा
    August 1, 2014

    निर्मला जी उत्साह बढ़ाने के लिए अनेकों धन्यवाद ……….. आप जैसे रचनाकारों से मिली तवज्जो से मेरी कलम को नई रवानी मिलती है ..

pkdubey के द्वारा
August 1, 2014

सादर आदरणीया,सुन्दर और प्रेरणादायक रचना |

    mrssarojsingh के द्वारा
    August 1, 2014

    आदरणीय दुबे जी आप का बहुत बहुत धन्यवाद ….. आशा है आगे भी आप का साथ बना रहेगा …..


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