कुछ कही कुछ अनकही

सुर्खरुँ करेँ इन्सान को,जमाने की अाधिँयाँ,फजाँ-ए-जमीँ मेँ इतनी ता कत तो नहीँ।तुम समझे थे टूट जायेँगेँ ठोकरोँ से। इन्साँ हैँ हम कोई इमारत तो नहीँ।

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ख्वाहिशों का खाली सागर ....

Posted On: 24 Mar, 2014 Others में

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ख्वाहिशों का खाली सागर
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चला था वो सु-ए मंजिल बड़ी हसरतों से /
क्या थी खबर हर मोड़ पर पड़ेगा वास्ता ठोकरों से /

सफर के आगाज़ में थे आँखों में ख्वाब फूलों के ,कलियों के/
अंजाम तक पहुंचे तो बस जख्म थे कुछ और काँटों का साथ था /

बड़ा नाज़ था अपने चेहरे की मुस्कान पे जिसको /
अश्कों से धोना पड़ता है अब रोज़ अपना चेहरा उसको /

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2 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

    mrssarojsingh के द्वारा
    March 28, 2014

    अवशय आनंद जी .


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