कुछ कही कुछ अनकही

सुर्खरुँ करेँ इन्सान को,जमाने की अाधिँयाँ,फजाँ-ए-जमीँ मेँ इतनी ता कत तो नहीँ।तुम समझे थे टूट जायेँगेँ ठोकरोँ से। इन्साँ हैँ हम कोई इमारत तो नहीँ।

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झील में तारों की परछाइयाँ ......

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झील में तारों की परछाइयाँ
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अहसान है तेरा ऐ चाँद /
रोशन कर दी तूने /
काली स्याह रातें /
समाकर रोशनीसूरज की खुद में /

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साँझ ढली तो चल दिया सूरज /
अपने आशियाने को /
नन्हे नन्हे दीयों ने ही तब /
बनाई पूनम /
वो अमावस की रात /

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बैठे हैं परिंदे पेड़ों पर /
इस उम्मीद में /
झील में तारों की परछाइयाँ /
करेंगी रोशन उनका घोंसला /

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रोशनी के लिए तो दिए ही जलाने होंगे /
जंगल की आग से भी कभी हुई है रोशनी ????????

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4 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

    mrssarojsingh के द्वारा
    March 11, 2014

    आपके द्वारा मिली यह प्रशंसा मेरे लिए अनमोल है योगी जी .. बहुत हिम्मत मिलती है अपने लफ्ज़ों को कोई रूप देने के लिए ….ऐसे उत्साह बढ़ाने वाले ब्लॉग मित्रों की उत्साहवर्धक प्रतिक्रियों से ……………. आगे भी आपसे ऐसे ही प्रतिक्रया की उम्मीद के साथ सादर अभिनन्दन …..

deepak pande के द्वारा
March 11, 2014

रोशनी के लिए तो दिए ही जलाने होंगे / जंगल की आग से भी कभी हुई है रोशनी बहुत खूब आदरणीय सरोज जी वैसे रौशनी के लिए तो जुगनू hee काफी हैं खुद के साथ साथ दुनिया को भी रोशनी का सन्देश देते हैं

    mrssarojsingh के द्वारा
    March 11, 2014

    रचना पर आपके कमेंट का धन्यवाद है दीपक जी… आपने ठीक कहा दीपक जी जुगनू भी रौशनी तो करते ही है …पर आखरी बार मैंने कब जुगनू देखे थे कुछ याद नहीं है बदलते वक्त के साथ क्या बदल गया पता नहींऔर अभी क्या क्याबदलेगा पता नहीं खैर आप फिर से एक बार धन्यवाद है सादर अभिनन्दन सहित …


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