कुछ कही कुछ अनकही

सुर्खरुँ करेँ इन्सान को,जमाने की अाधिँयाँ,फजाँ-ए-जमीँ मेँ इतनी ता कत तो नहीँ।तुम समझे थे टूट जायेँगेँ ठोकरोँ से। इन्साँ हैँ हम कोई इमारत तो नहीँ।

175 Posts

167 comments

Reader Blogs are not moderated, Jagran is not responsible for the views, opinions and content posted by the readers.
blogid : 13246 postid : 698961

गीत कोई लिखना जो चाहा इक दिन मैंने ....

Posted On: 5 Feb, 2014 Others,Junction Forum,Contest,Hindi Sahitya में

  • SocialTwist Tell-a-Friend

गीत कोई लखना जो चाहा इक दिन मैंने

गीत कोई लिखना जो चाहा इक दिन मैंने
तैर गई आँखों में तस्वीरें कितनी ..
छिपे थे कितने रंग अनेकों ..
कहकशायें थी ,टूटे हए कुछ सितारे थे ….
बहारों की दास्ताँ थी …
गाते गुनगुनाते परिंदों की सरगम थी ….
फूलों की महक भी थी ..
हवाओं की सरगोशियाँ थी ..
बदलियों के आने की आहट थी ..
था इक इंद्रधनुष सतरंगी भी दूर क्षितिज पर ….
सपनों की ऊंची ऊंची सी परवाज़ें थी ….
कुछ मौन स्वरों का आलाप भी था …
छिपा हुआ सा कहीं कोई इक नेह का आह्वान भी था ..
माँ के आँचल का सुहाना साया था …
बाबू जी के प्यार का असीम अनंत सरमाया था ….
अपने परायों की कुछ खट्टी मिठ्ठी रंजिशे कुछ प्यार था …
अनकहे अधलिखे कुछ लफ्ज़ों का शिकवा था ..
खुद के लिए न जो जिए कभी उन पलों की शिकायत थी ..
नहीं अपनाया जिन राहों को उनकी भी कहीं चुभन थी …
चले ही नहीं जिन राहों पर, उस सफर की पैरों में थकन थी ..
इन सब को चुनकर जो गीत बुना …
वो गीत नहीं ….
मन के मेरे किसी कोने में ही छिपी कोई झंकार, कोई सरगम थी …
मुझको ही मुझसे मिलाने वाले कुछ लफ्ज़ों की साज़िश थी …
लिखूंगी इक दिन फिर कोई गीत ….
जो नहीं होगा शायद ..
मेरी कलम और लफ्ज़ों की साज़िश का शिकार फिर एक बार ……….

Rate this Article:

1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (8 votes, average: 5.00 out of 5)
Loading ... Loading ...

2 प्रतिक्रिया

  • SocialTwist Tell-a-Friend

Post a Comment

CAPTCHA Image
*

Reset

नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

mrssarojsingh के द्वारा
February 16, 2014

धन्यवाद कविता जी ….आपका साथ भविष्य में भी मिलता रहेगा इस आशा के साथ …….

kavita1980 के द्वारा
February 13, 2014

भावनाओं का सम्प्रेषण बेहतरीन अंदाज़ में –छू लेने वाले भाव -बधाई


topic of the week



latest from jagran