कुछ कही कुछ अनकही

सुर्खरुँ करेँ इन्सान को,जमाने की अाधिँयाँ,फजाँ-ए-जमीँ मेँ इतनी ता कत तो नहीँ।तुम समझे थे टूट जायेँगेँ ठोकरोँ से। इन्साँ हैँ हम कोई इमारत तो नहीँ।

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बचा ही लेंगें हर कश्ती को साहिल ,यह जरूरी तो नहीं ,,(कांटेस्ट) द्वितीय पुरस्कार ..

Posted On: 30 Jan, 2014 Contest में

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खारो- ज़ार भी तो बनते हैं नसीब किसी किसी का ,
हो गुलशन पे हक़ सभी का ,यह जरूरी तो नहीं ,,

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बर्क़ बन कर बरसे यूँ तो , अल्फ़ाज किसी के दिल की जमीं पर ,
अश्क बहा कर ग़म अपना दिखाएँ हम यह जरूरी तो नहीं ,,

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बच के तूफानों से किनारों पर आ तो गई हैं कश्तियाँ ,
बचा ही लेंगे साहिल हर कश्ती को यह जरूरी तो नहीं।,,

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तमन्ना होती है हर दिल में नसीमे -बहार की ,
हर नसीमे -सहर, बहारों को साथ लाये यह जरूरी तो नहीं ,,

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कभी ख़ाक भी अर्श पे आशियाँ अपना बना ले ,नसीबों की बात है ,
हर ज़र्रा फ़लक का सितारा बन जाये यह जरूरी तो नहीं ,,

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आंसू और आहें बन कर भी तो निकलते हैं अरमान कभी कभी ,
नग़मा बन कर ही महके हर किसी के अरमां यह जरूरी तो नहीं ,,

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मुद्द्त से छिपाये हुए हैं शिकवे दिल में हजारों ,
सारे शिकवों को मगर मिल ही जाये जुबां यह जरूरी तो नहीं ,,

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माना कि खिले हुए फूलों से महक उठता है गुलशन सारा ,
खुश्बू सारी खो ही जाये मुरझाये हुए फूलों की यह जरूरी तो नहीं ,,

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4 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

mrssarojsingh के द्वारा
February 20, 2014

निर्मला जी मैं तो आपकी रचनाओं की कायल हूँ और आपकी हर कृति को पढ़ती हूँ …..ऐसे में आपसे मिली यह तारीफ मेरे लिए अनमोल है …..आपका बहुत बहुत धन्यवाद ….आगे भी आपका साथ मिलता रहेगा इसी उम्मीद के साथ सरोज ……….

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
February 20, 2014

तमन्ना होती है हर दिल में नसीमे बाहर की ,हर नसीमे सहर बहारों को साथ लाये ये जरूरी तो नहीं ,आदरणीय सरोज जी ,आपने अपनी रचना में हकीक़त वयां की है ,दोहरी बधाई , आभार , निर्मल

mrssarojsingh के द्वारा
January 31, 2014

ब्लॉग मित्रों द्वारा मिलने वाले ऐसे कमेंट्स बहुत हौंसला बढ़ाते हैं और लेखनी को एक नई रवानी दे जाते है संजय जी धन्यवाद स्वीकार करें ..

sanjay kumar garg के द्वारा
January 31, 2014

“बर्क़ बन कर बरसे यूँ तो, अल्फ़ाज किसी के दिल की जमीं पर,अश्क बहा कर ग़म अपना दिखाएँ हम यह जरूरी तो नहीं” सुन्दर ग़ज़ल के लिए बधाई! आदरणीया सरोज जी!


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