कुछ कही कुछ अनकही

सुर्खरुँ करेँ इन्सान को,जमाने की अाधिँयाँ,फजाँ-ए-जमीँ मेँ इतनी ता कत तो नहीँ।तुम समझे थे टूट जायेँगेँ ठोकरोँ से। इन्साँ हैँ हम कोई इमारत तो नहीँ।

174 Posts

167 comments

Reader Blogs are not moderated, Jagran is not responsible for the views, opinions and content posted by the readers.
blogid : 13246 postid : 696294

पूछे कोई जो सवाल कभी , थोड़ा सा बस मुस्कुरा देना

Posted On: 30 Jan, 2014 Others में

  • SocialTwist Tell-a-Friend

अपने ग़म अपनी खुशियों का हिसाब ,हर किसी को मत देना /
अनजानी ,अजनबी हवाओं के हाथों में पतवार मत देना /
है उजाला उतना ही काफी , चिरागों से जो मिला /
नहीं है कोई आफ़ताब से अब हमको गिला /
जिन्दगी की राहों में अक्सर, ख़ारों ने ही साथ दिया मेरा /
मिले तो थे फूल भी, पर जाने क्यों उनसे रिश्ता निभा नहीं मेरा /
आये दिन कुछ सवाल, बस यूँ ही तंग करते है /
अजब हैं हम इंसान भी ,हरदम खुद से ही जंग करते हैं
हालत पे अपनी नसीबों के खेल को, कभी मत इल्जाम देना /
पूछे जो कोई यह सवाल कभी, तो थोड़ा सा बस मुस्कुरा देना /

Rate this Article:

1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (2 votes, average: 5.00 out of 5)
Loading ... Loading ...

2 प्रतिक्रिया

  • SocialTwist Tell-a-Friend

Post a Comment

CAPTCHA Image
*

Reset

नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

mrssarojsingh के द्वारा
January 31, 2014

बहुत बहुत धन्यवाद आपका संजय जी ,, आशा है कि भविष्य में भी आपके ऐसे सुंदर कमेंट्स कुछ नया लिखने की हिम्म्त बढ़ाते रहेंगे .

sanjay kumar garg के द्वारा
January 31, 2014

“अपने ग़म अपनी खुशियों का हिसाब ,हर किसी को मत देना, अनजानी ,अजनबी हवाओं के हाथों में पतवार मत देना” सुन्दर अभिव्यक्ति आदरणीया सरोज जी!


topic of the week



latest from jagran