कुछ कही कुछ अनकही

सुर्खरुँ करेँ इन्सान को,जमाने की अाधिँयाँ,फजाँ-ए-जमीँ मेँ इतनी ता कत तो नहीँ।तुम समझे थे टूट जायेँगेँ ठोकरोँ से। इन्साँ हैँ हम कोई इमारत तो नहीँ।

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युध्द के वो दिन और दहशत भरी यादें ...........संस्मरण (कांटेस्ट)

Posted On: 17 Jan, 2014 Contest में

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युद्ध के वो दिन और दहशत भरी यादें (संस्मरण )

पिछले साल टेलीग्राम को लेकर काफी भावनात्मक विदाई दी गई। अख़बार हो या टीवी के न्यूज़ चैनल सभी लोगों को आपस में जोड़ने वाले इस पुराने माध्यम से बिछड़ने के दुःख से व्यथित नजर आये। वैसे तो लोगो को जोड़ने वाला गरीब और पुराना हो चुका यह टेलीग्राम इतना चर्चा में कभी नही आया होगा जितनी चर्चा इसकी विदाई के वक्त हुई। यह बिलकुल ऐसा ही है जैसे हम अमूमन जिन्दा इंसानों की उतनी कद्र नही करते जितनी उनके जाने बाद करते हैं। जिनको उनके जीवन में पूछते भी नहीं उन्ही की शान में बाद में कसीदे पढ़ते नही थकते . ……….. कैसा है हमारा यह समाज ? जाने वालों से यह व्यवहार मेरी समझ से बाहर है ?
खैर जब सब टेलीग्राम को भावभीनी विदाई दे रहे थे तब मेरे मन में भी इस से जुड़ी हुई कुछ भावनाएं सर उठा रही थी यह बात और है कि मेरे मन में टेलीग्राम को लेकर कुछ दहशत जैसे भाव जुड़े हुए हैं .
जैसे टेलीग्राम का नाम सुनते ही सब घरवालों का किसी अशुभ खबर की आशंका से एकदम डर जाना,पडोस में डाकिये का आना और फिर …….. किसी खबर का कहर की तरह टूट पड़ना ……मेरे बाल मन ने टेलीग्राम को बुरी खबर से नत्थी कर रखा था। इसका एक और कारण भी था।

यह उन दिनों की बात है जब १९७१ का भारत -पाकिस्तान का युद्ध चल रहा था। हम लोग आगरा छावनी में ” सपेरटेड फैमिली ऑकमोडेशन ” में रहते थे .आस पास सभी परिवार अकेले रहते थे क्योंकि सब फौजी जवान /ऑफिसर्स बॉर्डर पर ही पोस्टेड थे . वैसे तो युद्ध का माहौल कई महीनों से बना हुआ था। खिड़कियों पर काले कागज लगा दिए गये थे। हफ्ते में कई बार रात को साईरन की आवाज के साथ ब्लैकआउट की प्रैक्टिस होती थी। पर तीन दिसम्बर की रात को नौ बजे के आसपास जो साईरन बजा और आगरा सहित कई और एयर फाॅर्स के अड्डों पर बम बरसाते हुए भयानक आवाज के साथ जब वो लड़ाकू विमान गुजरे तो और उस युद्ध की शुरुआत हो गई जिसने हम सब के मन में दहशत भर दी . …………..
नहीं वो दहशत हमारे अपने लिए नहीं थी बल्कि हमारे उन अपनों के लिए थी जो अपने परिवारों से तो दूर थे ही ऊपर से दुश्मन की गोलियों और बमों को भी झेल रहे थे।
स्कूल कॉलेज बंद हो गये थे। सब अड़ोसी पड़ोसी सारा समय एक साथ ही बिताते थे। खाना पीना तो नाम का रह गया था। हम सब छोटे बच्चे भी सहमे हुए थे उन्हें ज्यादा कुछ समझ नही आता था पर इतना पता था की सब के पापा की चिठ्ठी आनी बंद हो गई हैं। हर वक्त सभी लोग बस खबरें सुनते रहते थे। मुझे तो इतना याद है की जैसे ही खतरे का साईरन बजता था मैं अपने से ज्यादा अपने पापा की सलामती के लिए सोचती थी कि वो जहाँ भी हों बस ठीक हों।
युद्ध शरू होने के चार -पांच दिनों के बाद माहौल और भयानक हो गया जब पास पडोस में पोस्टमैन टेलीग्राम लेकर आता और ……………फिर जो कुछ मेरी यादों से वाबस्ता है वो दोहराना बहुत कष्टकर है ….. देखते ही देखते कितने जाने पहचाने फौजी जवान और ऑफिसर्स देश पर कुर्बान हो रहे थे और लगातार टेलीग्राम आ रहे थे।
उफ ! मेरे मन वो दृश्य आज भी जीवंत हैं .
हर सुबह एक भयावह डर के साथ शुरू होती थी।
बस एक ही प्रार्थना …….भगवान पोस्टमैन हमारे घर की तरफ न आये.…
एक एक कर कैसे वो दिन गुजरे यह सिर्फ कोई भुक्तभोगी ही महसूस कर सकता है .
जैसे तैसे युद्ध खत्म हुआ …………
युद्ध विराम की घोषणा से बड़ी राहत मिली ……..

बांगला देश के रूप में एक नये राष्ट्र का जन्म हुआ …….
हिंदुस्तान ने बहुत बड़ी विजय हासिल की………
सारे देश ने खुशियाँ मनाई ……
पर कुछ दिलों को ऐसे जख्म मिले जो समय भी नही कभी नहीं भर पाया ……..
कितने घरों में बच्चों के पापा वापिस नहीं आये ………
आये तो बस टेलीग्राम ………..
दिल दहला देने वाली खबर लेकर ………

और तब से मेरे मन में टेलीग्राम के नाम पर जो दहशत बस गई वो कभी खत्म नहीं हुई ….
आज टेलीग्राम तो विदा हो गया …..
पर वो डरावने पल एक बार फिर ताजा कर गया ………

अलविदा .. टेलीग्राम।

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