कुछ कही कुछ अनकही

सुर्खरुँ करेँ इन्सान को,जमाने की अाधिँयाँ,फजाँ-ए-जमीँ मेँ इतनी ता कत तो नहीँ।तुम समझे थे टूट जायेँगेँ ठोकरोँ से। इन्साँ हैँ हम कोई इमारत तो नहीँ।

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कर दिए हैं बंद मैंने दरवाज़े अल्फ़ाज़ों के ..............

Posted On: 18 Nov, 2013 कविता,Junction Forum,Hindi Sahitya में

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रात मैंने खिड़की खोली ,,,,,,,,,,
और ,,,,,,,,,
कहा चाँद से,,,,,,,,,
चेहरे पे मेरे चांदनी जऱा बिखरा दे ,,,,,,,,,,
अपनी उजली किरणों से मन मेरा महका दे ,,,,,,,

कहा मैंने चाँद से यह भी ,,,,,,,,,
कि ,,,,,,,,
बंद कर दिए हैं मैंने ,,,,,,,,,
आज से दरवाज़े अल्फाजों के ,,,,,,,,,
और ,,,,,,,,,,,,,
खोल दी हैं वो खिड़कियाँ सारी,,,,
बोलती हैं खामोशियाँ जहां ,,,,,,,,,
मुस्कानें हैं जहाँ जुबां जज्बातों की ,,,,,,,,,,,,,
हर अहसास की रूह आजाद है जहां ,,,,,,,,,

इसलिए ऐ चाँद ,,,,,,,,,,,
अब से तू मेरे घर न आना,,,,,,,,
उन दरवाजों से ,,,,,,,,,
आना तो बस इस खिड़की से ,,,,,,,,,
जो खुली रखी है मैंने तेरे लिए ,,,,,,,
और ,,,,,,,,,,,,,,
तेरी शफ्फाक़ चांदनी के लिए ,,,,,,,,,
जो जब आये इधर,,,,,,,,,,
तो,,,,,,,,,,,
हर ज़र्रा मेरे घर का हो उठे रोशन ,,,,,,,,,
तो …………
ऐ चाँद अब से तू मेरे घर आना तो ,,,,,,,,
बस इसी खिड़की से आना ,,,,,,,,,,,,,,

इसी खिड़की से आना ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,

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2 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

mrssarojsingh के द्वारा
November 20, 2013

सीमा जी ,,आपके यह अल्फाज़ मेरी हिम्मत-अफजाई करने के साथ साथ मेरी कलम को एक नई रवानी और मेरे चेहरे पर एक नई रौनक दे गए ………………. आगे भी आपसे ऐसी ही मेहरबानी बनाये रखने की उम्मीद के साथ …….. अनेकों धन्यवाद सहित …… सरोज,,,,,,,,,,,,

seemakanwal के द्वारा
November 20, 2013

खूबसूरत नज़म .आभार


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